फूल खिलते हैं बहारों का समां होता है,
ऐसे ही मौसम में तो प्यार जवां होता है ||
छददू के हृदय में भी प्रेम उमड़ने लगा था| उसके भी तन बदन में प्रेम के फुव्वारे फूटने लगे थे| जिस पुरुष का ध्यान कभी कभार पुस्तकों से हटता था| आज उसी का ध्यान पुस्तकों में लगता ना था|
हर पल अब तो उसके मस्तिष्क में शाहरुख़ खान की चित्रकथा का वही गाना गुनगुनाया करता था -
किताबें बहुत सी पढ़ी होंगी तुमने
मगर कोई चेहरा भी तुमने पढ़ा है
पढ़ा है मेरी जान नजर से पढ़ा है
बता मेरे चेहरे पे क्या क्या लिखा है||
छददू भले ही कैसा हो किन्तु उसकी पसंद लाजवाब थी| अपने दिल में जगह दी भी तो किसे!!
अपनी ही कक्षा की एक छात्रा – वन एंड ओनली “SHEELA BHALOTIA”
अब दिल करता है हौले हौले से मैं खुद को गले लगाऊं
किसी और की मुझको जरूरत क्या मैं तो खुद से प्यार जताऊँ
My name is Sheela….Sheela Bhalotia
एक दिन शाम के समय जब शीला कहीं दूर किसी पेड़ के सहारे बैठे किसी पुस्तक का अवलोकन कर रही थी| तभी किसी दिशा से आ रहे छददू की नज़र उस पर पड़ी| उसके तत्पश्चात क्या!! छददू के मस्तिष्क में खलबली होनी लगी कि किस प्रकार शीला से वार्ता की जाए|
अधिकतर ऐसी परिस्थितियों में छददू का दिमाग काम करना बन्द कर देता था| उस दिन भी कुछ अनोखा नहीं हुआ| जब उसे आभास हुआ कि वह और कुछ नहीं सोच सकता तब वह दबे पैर पेड़ की ओर चला|
पेड़ के पीछे पहुँचने के बाद एक दम से चिल्लाया – “भाऊऊऊऊऊऊ”|
शीला का तो मानो दिल ही बहार निकल आया हो| उसके हाथों में जो पुस्तक थी वोह हवा में उड़ चली और वह स्वयं धरती पर| उस दृश्य को देखकर छददू स्वयं धरती पर लोटपोट होने लगा| थोड़ी देर बाद जब शीला का दिल पुनः स्वाभाविक गति से दौड़ने लगा, तब वह अपने सिर में लगी मिटटी झड़काते हुए बोली – “यह क्या मजाक है!! हमें ऐसी चीज़ें बिलकुल भी पसंद नहीं हैं|”
“वैसे भी हम अभी हिटलर की आत्मकथा पढ़ रही थीं| उसके कारण हमारा मस्तिष्क पहले से ही अत्यंत गर्म है और ऊपर से छददू तुम|”
किसी प्रकार छददू अपने वस्त्रों को झड़काता हुआ ऊपर उठा और बोला – “Sorry, SheelaJi. I am really sorry”
“मुझे नहीं पता था की आप हिटलर की आत्मकथा का पाठन कर रही हैं, अन्यथा मैं ऐसी गलती कदापि नहीं करता|”
“शीलाजी आप मुझसे नाराज़ तो नहीं हैं ना??” – छददू
“ऐसी बात नहीं है किन्तु अगली बार से हमारे साथ ऐसा मजाक ना करना|” - शीला
“Pakka Promise SheelaJi.” – छददू
“वैसे आपकी आज्ञा हो तो मैं आपको कुछ सुनना चाहता था”
“अभी??” – शीला
“आपको कुछ खास काम है क्या?” – छददू
“नहीं ऐसी बात तो नहीं है| सुनाओ क्या सुनना चाहते हो!” – शीला
“वैसे आपने वोह तो सुना ही होगा..” – छददू
“The Dialogue of Devdas – बापू जी ने कहा घर छोड़ दो..फिर माँ ने कहा पारो को छोड़ दो..फिर पारो कहती है शराब को छोड़ दो…एक दिन आएगा जब वोह कहेगा कि दुनिया ही छोड़ दो”
“देखो छददू पकाओ मत, फिर तुम्हें पता ही है कि हम हिटलर कि आत्मकथा पढ़ रहे हैं” – शीला
“अरे शीलाजी पूरा तो सुनिए..इसे सुनने के बाद आपका दिल Garden Garden हो जाएगा”
“O.K. फिर सुनाई ही डालो” – शीला
“माँ ने कहा अ आ इ ई उ ऊ सीखो
बापूजी ने कहा 1 2 3 4 सीखो
प्रोफ ने कहा डाटाबेस सीखो
आज मेरे मित्र डांडू ने कहा तेलुगु सीखो
एक दिन आएगा जब वोह आएगी और कहेगी
बहुत कुछ सीख लिया….चल बे अब काम कर|” – छददू
That was not over and Chhaddu was on the floor laughing on his own lines.
“वाह! वाह! क्या dialogue था छददू!! मेरा दिल तो वास्तव में Garden Garden हो गया | हमें तो आपको चूमने का मन कर रहा है|” – शीला
For Chhaddu, the wind stopped blowing any more. He himself stopped rofling any more. He was not believing his senses any more. He felt as if he was not living any more.
“शीलाजी क्या बोला आपने?? एक बार फिर से बोलिए ना” insisted Chhaddu.
“हाँ, हाँ, क्यूँ नहीं!! आप क्षण भर के लिए धरती माँ की गोद छोड़कर ऊपर तो उठिए” – शीला
Chhaddu stood on his feet almost in the similar fashion Hrithik came out of the manhole in Dhoom-II. He brought his ears close to Sheela anticipating that Sheela would kiss his cheeks instead. He closed his eyes and said – “बोलिए ना शीलाजी”
टपाकक्क्कक्क्क्कक्क्क!!!!!!!!!!!!!!!!
छददू के गाल पर अपने पंजे का चिन्ह देने के पश्चात, गुस्से में तमतमाते हुए शीला बोली – “बहुत दिमाग चाट लिया.. चल अब आराम कर|”
P.S. 2. All the characters in the post are purely fictitious. Any resemblance to dead or alive is purely coincidental.
I like the story n it’s cool….:) .. bt It’s not readable .. may be change ur font type….!
n yeah .. punches could have improved.. bt I must better than the last one .. keep it
yeah now it’s cool
Nice !